Friday, February 28, 2020

बाज़ार वाली सड़क

इस बार समर्थ की बारहवीं की बोर्ड की परीक्षाये थी। हरिया चाहता था कि समर्थ को शहर भेजे अच्छी कोचिंग के लिए। आखिर पढाई - लिखाई ही तो आगे बढ़ने का सबसे बेहतर जरिया होता है- कम से कम हर किताब और हर बड़ा आदमी तो यही शिक्षा देता था। जीवन में जहाँ तक वह स्वयं नहीं पहुँच सका , समर्थ को भेजना था। और इस बार तो खूब मेहनत करके रिकार्ड तोड़ फसल पैदा की थी, अपनी 5 एकड़ जमीं से। ऊपर से इस बार प्रकृति माँ ने भी पूरा साथ दिया था। मानसून भी समय से आया था, ही फसल में कोई बीमारी आयी पिछले कुछ सालों की तरह। इतनी अच्छी पैदावार होने पर काफी कुछ ख्वाबो के महल तैयार किये थे हरिया ने।
पर प्रकृति माँ से भी ऊपर एक शक्ति काम करती थी - वह थी बाजार की शक्ति- प्रकृति के आशीर्वाद ने सारे क्षेत्र में रिकॉर्ड पैदावार पैदा की थी , और इतनी ज्यादा आपूर्ति होने से फसल के दाम में खूब गिरावट आयी। समर्थ ने भी अख़बार में एक नयी खबर ढूंढ निकाली कि समुद्रो पार बसे किसी दूर के देश में भी अच्छी फसल होने से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भी फसल की कुछ ख़ास कीमत नहीं।
" पिताजी , मुझे एक बात समझ नहीं आती। मैंने कभी आटे का दाल का या मसाले के पैकेट, कपडे का भाव साल दर साल कम होते नहीं देखा ! जब बाजार में हम सामान बेचने  जाते है , तभी साल दर साल भाव क्यों गिरता है , जब खरीदने जाते हैं, तब तो कभी भाव नहीं गिरता? !" समर्थ के इस साधारण से सवाल ने हरिया के माथे की शिकन को कुछ अलग सा ही रूप दे दिया!  चिंता भरी रेखाओं की जगह एक अनजाने अनभिज्ञ से चेहरे ने ले ली थी। शायद  हरिया के पास इसका कोई जवाब नहीं था। समर्थ तो पढ़ने के लिए शहर ही जा सका बल्कि बारहवीं के बाद उसे पढाई बीच में ही छोड़नी पड़ी।
समर्थ के उस साधारण से सवाल का जवाब कहीं और उसे ढूंढ रहा था।
सुदर्शन की अपनी अनाज मंडी में आढ़त की दुकान थी। व्यवहार एकदम सुशील , बीड़ी गुटका शराब - कोई ऐब नहीं - और पूर्णतः शाकाहारी।  जीवन में शायद ही किसी से झगड़ा किया होगा सुदर्शन ने। झगड़ा और जद्दोजहद होती तो मानसिक , आकांक्षाओं की।  कौन सा नया बिज़नेस खोला जाये , कपडे में ज्यादा मुनाफा है या किरयाने की या सीमेंट की दुकान से । भले ही छोटी शुरुआत हो , पर हो जरूर!
आढ़त की दुकान से लगातार कमाई की एक धारा तो थी ही। छोटे छोटे किसान मज़दूर जिनका  हमेशा ही आमदनी से ज्यादा ख़र्चा होता है। जिन्हे बैंक ऋण देने से कतराते हैं ऋण देते भी हैं तो एक सीमा तक ही दे सकते हैं। ऐसे सभी जगह से ठुकराए हुए आते थे सुदर्शन के पास ऋण लेने। हाँ ! ब्याज बैंक से करीब चार गुना था। जहाँ बैंकों का ऋण दस सालो में दुगुना सुदर्शन का ब्याज अढाई साल में ही दुगुना हो जाता है। और मज़े की बात तो यह कई बार तो सुदर्शन बैंक से पैसे लेकर ही किसानों को देता है।

अपनी पिता की दैनिक जद्दोजहद और ऊपर उठने की चाह ने नक्षत्र के मन में भी कई अरमानों का डेरा बसाया था। नक्षत्र सुदर्शन का एकमात्र पुत्र था। नक्षत्र की अपने छोटे से शहर से निकलकर अपनी आकाँक्षाओं को एक बड़े शहर में पंख देने की चाहत थी। दिन रात पढाई करने के बाद देश के जाने माने कॉलेज से एम बी ए करने के पश्चात आज नक्षत्र एक एम एन सी में कार्य करता था। "लाइफ सही है, टेंशन नहीं है " की तर्ज़ पे  समय व्यतीत हो रहा था। स्पोर्ट्स बाइक और ब्रांडेड महंगे गैजेट्स और एडवेंचर स्पोर्ट्स का शौक था नक्षत्र को। अब तो वह बाइक स्टंट् राइडिंग भी सीख रहा था। बस इन सब शौक से ही वह  ज़िन्दगी में थोड़ा स्पाइस भरना चाहता था।  

समझने वालों के लिए आरोही एक धीमे बहती नदी की तरह थी। बाहर से शांत पर अपने अंतर्मन में छुपाये हुए पूरा समंदर का समंदर। न समझने वालो के लिए एक अमीर बाप की बिगड़ी हुई नहीं बल्कि कुछ  ज्यादा  ही सीधी - सुलझी औलाद ! आरोही के पिता श्यामल एक जाने माने चावल एक्स्पोर्टर (निर्यातक) थे। खुद की क़रीब 20 चावल की मिल थी। प्रदेश की अर्थव्यवस्था में एक खास भूमिका थी उनकी। पर आरोही को ना जाने क्यों दुनियादारी से इतना लगाव नहीं था। बचपन भरे पूरे लाड़ प्यार से बीता। और शायद इसी आज़ादी ने उसे मसलो को देखने अपने से इतर दूसरे के नज़रिये से देखने की काबिलियत दी। रूचि कारोबार में नहीं थी कारोबार से सम्बद्ध इंसानी सम्बन्धो में थी। 

"पिताजी! ये किसानों को अपनी फसल का उचित दाम नहीं मिलता ! देश में कितनी गरीबी है। किसान आत्महत्या कर रहे है! कभी कभी तो ऐसा लगता है हम लोग ही इन सब गरीबों का शोषण करते हैं। धान को इतने सस्ते भाव में खरीदा जाता है इनसे! "

"हमारा भी क्या ही दोष हैं? किसान से धान हम तक आने में बिचौलियों की पूरी फौज है। ऊपर से मार्किट कमिटी के सरकारी अफसरों को जाने वाली मंथली रकम "

"पर आप भी तो चंद बड़े निर्यातकों के साथ सलाह करके रेट को बढ़ने ही नहीं देते। क्या ये फिक्स नहीं किया जाता कि इस रेट से ऊपर कोई उपज नहीं खरीदेगा। "

"बेटा ! हमें भी अपनी मिलें चलानी है। तुम्हे पता भी है यहाँ तक आने के लिए मैंने क्या क्या पापड़ बेले हैं। तुम्हे अंदाज़ा भी है धान से चावल निकाल कर उपभोक्ता की प्लेट तक पहुँचाने में कितना प्रबंधन करना पड़ता है। यूँ ही नहीं सब कुछ इतना सुचारु रूप से चलता है। और फिर अगर उपज  का भाव बढ़ा दिया तो गरीब उपभोक्ता कैसे अपना पेट भरेगा ! हमारे जैसे उद्योगपतियों की ही दूरदर्शिता है ये जो विकास दिख रहा है हम ही किफायती दामों पर आधुनिक वस्तुओ का निर्माण करके आम जनता का जीवन आसान बनाते हैं। "

"कुछ भी हो ! ये तो कहीं न कहीं  गलत ही लगता है मुझे। "

" बेटा संवेदना और दुनियादारी दोनों ही सामानांतर रेल की पटरी है जो एक दूसरे के साथ साथ चलती है पर कभी मिलती नहीं और इन्ही पर जीवन की गाडी सरपट दौड़ती है! अगर इन दोनों को मिला दिया तो जिंदगी आगे नहीं बढ़ पायेगी !"
इतनी गहरी बात सुन के आरोही अनायास ही चुप हो गयी।

आज समर्थ बड़ा ही खुश था। उसने कभी नहीं सोचा था कि ज़िन्दगी में उसके पास भी कभी गाडी होगी। आज ही उसने शोरूम से दूसरी एस यु वी. निकलवाई।  दरअसल हुआ यूँ कि सरकार ने हरिया की ज़मीन से कुछ ही किलोमीटर दूर एक्स्प्रेसवे निकलने की योजना निकाल दी और देखते ही देखते गांव की ज़मीन के भाव आसमान छूने लगे। लगभग 35 करोड़ में हुआ था 5 एकड़ ज़मीन का सौदा। एक बड़े पूंजीपति ने सारी की सारी ज़मीन खरीद ली हरिया की। और कायापलट हो गया समर्थ का। अब पढाई छोड़े हुए करीब 5 साल हो गए थे समर्थ को । अब किताबो से वो लगाव नहीं रहा जितना गाड़ी से, क्लब-पार्टीयों और जिम से।
नक्षत्र ने ये कभी सोचा नहीं था कि आज पिंक स्लिप पाने का उसका मौका आ जायेगा। उसने पिछले 5 साल कंपनी के लिए जी भर कर और पूरी मेहनत से काम किया। उसे पूरा यकीन था कि इस साल उसका प्रमोशन कोई नहीं रोक पायेगा। किन्तु पिछले 1 महीने से अंतराष्ट्रीय वित्तीय स्थिति में भयंकर उथलपुथल हुई थी।  दस साल पहले हुए फाइनेंसियल रिसेशन ने एक बार फिर दस्तक दी। और कंपनी ने छंटनी शुरू कर दी। आज उसे कंपनी ने 3 महीने की तनख्वाह के साथ हाथ में पिंक स्लिप थमा दी।
पिछले 5 साल में आरोही भी काफी बदल गयी थी। ईरान को होने वाले निर्यात पर अमेरिका के भारी प्रतिबंधों की वजह से वहाँ चावल निर्यात होना लगभग बंद ही हो गया था। जिससे की अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में चावल की कीमत में भरी गिरावट आयी थी।  रही सही कसर रिसेशन ने निकाल दी। सब कुछ इतना तेज़ हुआ कि श्यामल को समझने का मौका ही नहीं मिला। अब वह पुरानी उधेड़बुन लगभग ख़त्म ही हो गयी थी। श्यामल के साथ वह गरमागरम बहस भी अब नहीं होती थी। अब ज्यादा ध्यान इस बात पर रहता था कि बैंकों से लिए गए क़र्ज़ को चुका कर कैसे दिवालिया होने से बचा जाए।                                                                 
आज आरोही कई महीनो बाद बाज़ार वाली सड़क पर इवनिंग वॉक पर निकली थी।  हैडफ़ोन लगाकर संगीत में पूरी  तरह खोई हुई ज़ेबरा क्रॉसिंग पार करने लगी। दांयी तरफ से समर्थ पूरी गति से अपनी नयी एस यु वी  को दौड़ाता आ रहा था। चूँकि उसने आज ही यह एस यू वी नयी खरीदी थी, जोश ही जोश में वह भूल ही गया था कि शहर के अंदर स्पीड लिमिट भी होती है। उधर आरोही को गाड़ी के सामने देखकर समर्थ ने उसे बचाने के लिए स्टीयरिंग को एकदम से  दायी तरफ मोड़ दिया और गाड़ी लगभग नियंत्रण से बाहर हो गयी। सामने से विपरीत  दिशा से नक्षत्र अपनी  स्पोर्ट्स बाइक से पूरी गति से आ रहा था। नौकरी छूटने पर भविष्य की अनिश्चितता के बवंडर  से निकलने की कोशिश में उसने भी बाइक को हवा से बातें करवा रखी थी। बस इसी पल में एस यु वी और बाइक की जोरदार टक्कर हुई। आरोही यह सब देखकर एकदम सन्न रह गयी।

बाजार वाली सड़क की तरह ही बाज़ार भी ठोस, ठंडा और कठोर है। इसकी कोई संवेदना या दिल नहीं हैं  इसे फरक नहीं पड़ता , कोई कैसे भी सवारी कर रहा है , जब एक्सीडेंट होता है तो सबको फर्श पे ला सकता है। "सावधानी हटी , दुर्घटना घटी "
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बाज़ार वाली सड़क

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